खुले में कुर्बानी ना करे सफाई का विशेष रखें ध्यान:-शहर नायाब काज़ी (अहले सुन्नत)

खुली जगह पर न करें कुर्बानी, सोशल मीडिया पर न करें कोई पोस्ट, और सड़कों पर न पढ़े नमाज, दुसरे धर्मो की आस्था का रखे ख्याल।

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देहरादून: बंगाल और दिल्ली मे कुर्बानी को लेकर हो रहे विवाद और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नमाज़ वाले बयान पर आल इंडिया मुस्लिम जमात के प्रदेश अध्यक्ष व नाएब शहर क़ाज़ी (अहले सुन्नत) पीर सैयद अशरफ़ हुसैन क़ादरी ने बयान जारी किया है। प्रेस को जारी किये गये बयान मे सैयद साहब ने बहुत स्पष्ट अंदाज मे बाते कहीं है, उन्होंने कहा कि कुर्बानी इस्लाम के हिस्सो मे से एक हिस्सा है, खुदा ने हज़रत इब्राहीम को आजमाने के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देने का आदेश दिया था। ये कार्य खुदा को बहुत पसंद आया, इसी वजह से पैग़म्बरे इस्लाम ने भी मालदार मुसलमानो के लिए कुर्बानी को जरुरी करार दिया। यादगार के तौर पर सालो से कुर्बानी होती आ रही है। जो लोग यह समझते हैं कि कुर्बानी इस्लाम का हिस्सा नही है, वोह लोग ग़लत फहमी का शिकार है, और उन्होंने इस्लाम का अध्ययन नहीं किया है। 

 

 पीर साहब ने कहा कि नमाज़ रोड़ और चौराहों पर न पढी जाये, चूंकी नमाज़ मे खुलूस और अल्लाह की याद उसी वक्त हो सकती है जब नमाज़ पढ़ने वाले नमाज़ी को इतमिनान व सुकून हासिल हो। इस्लाम का नजरिया है कि नमाज पढ़ने वाले और खुदा के दरमियान कोई भी चीज़ बीच मे हाईल (रुकावट) न हो। रोड़ और चौराहों पर पढ़ने वाले व्यक्ति को इतमिनान व सुकून नही मिल सकता, यहां पर शोर व शराबा और ट्राफिक का हंगामा रहता है, इसलिए इतमिनान व सुकून हासिल नही हो सकता। मुसलमान मस्जिदो और घरो में नमाज़ पढ़े।

 

 उन्होंने ने कहा कि बाज शहरी और दिहाती इलाकों मे आबादी बढ़ जाने और मस्जिद के जूं के तू होने की वजह से एक साथ मे मस्जिद मे या ईदगाह मे नही आ पाते हैं। शरीयत ने इसकी व्यवस्था इस तरह की है कि एक बार इमाम पहली जमात करा दे, फिर दुसरी जमात दुसरा इमाम पढ़ा दे, आदमी ज्यादा हैं तो एक के अलावा एक ही मस्जिद या एक ईदगाह मे एक से ज्यादा जमाते हो सकती है। इस व्यवस्था को अपनाने से सारी समस्याएं खत्म हो जाती है।

 

 उन्होंने कहा कि पूरे भारत मे कुर्बानी पर कहीं प्रतिबंध नही लगा हुआ है, कुर्बानी खुली जगह पर न करें, स्लाटर हाउस या अपने घरों में कुर्बानी करें। कुर्बानी करते वक्त एक छोटा सा गड्ढा खोद ले, कुर्बानी के जानवर का खुन और अवशेष गड्डे मे दफन कर दें। और इस बात का भी ध्यान रखे कि कुर्बानी का फोटो, वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट न करें, अपने परिवार के नौजवान बच्चों को भी समझा दें। 

सैयद अशरफ़ हुसैन क़ादरी ने आगे कहा कि कुर्बानी का दिन साल मे एक बार आता है, उस दिन इस्लाम अपने अनुयायियों को सबक सिखाता है कि किसी को तक्लीफ़ मत दो। इसलिए दूसरे धर्मों के मानने वाले लोगो की आस्था व भावना को कोई ठेस न पहुंचे। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। और साथ ही उन जानवरों की कुर्बानी न करें जिन पर प्रतिबंध लगाया गया है। कुर्बानी के तीन दिनों में अगर कोई विवाद उत्पन्न होता है तो उसको शांतिपूर्वक अंदाज मे निपटाएं। और उच्च अधिकारियों को सम्पर्क करके जानकारी दें।

रिपोर्ट एम एम मलिक 

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